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Friday, May 8, 2026

समाजिक समरसता - एक सामाजिक आंदोलन

समाजिक समरसता


समरसता : एक सामाजिक आंदोलन

‘समाजिक समरसता’ समाजिक आदर्श का प्रत्यय है। यह एकत्व का चिंतन है, यह आत्मीयता या आत्मवत व्यवहार  का दर्शन है, जो एक आन्दोलन बन चूका है। वर्तमान स्वरुप में यह एक सामाजिक आंदोलन है; समाज के एकीकरण का, भावनात्मक एकता का और सामाजिक समानता का। प्रस्तुत शोधपात्र में एक नवीन सामाजिक आंदोलन के रूप में ‘सामाजिक समरसता’ की अंतर्वस्तु, आन्दोलन की अनिवार्यता, आन्दोलन की प्रासंगिकता और आन्दोलन की विश्वसनीयता की समीक्षा की गयी है।

अद्वैत के सिद्धांत पर आधारित हिन्दू संस्कृति;हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति अद्वैत के सिद्धांत पर आधारित संस्कृति है। भारत का अपना सामाजिक दर्शन है। विभेद हिन्दू सिद्धांत नहीं है, विभेद हिन्दू संस्कृति नहीं है। समाजिक समरसता यद्यपि समाजिक आदर्श का प्रत्यय है, यह भारतीय सामाजिक दर्शन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्य से उत्पन्न सामाजिक विचार है।

    समाजिक समरसता अद्वैत के सिद्धांत पर आधारित भारतीय संस्कृति की विशेषता है। हमारी सनातन मान्यता है कि सृष्टि में एक ही चैतन्य विद्यमान है। इस सन्दर्भ में समाजिक समरसता का प्रतिपादन (व्याख्या) अद्वैत के मूल भावना को सामाजिक व्यवहार में साकार करने के लिए किया गया था।

    सामान्य सन्दर्भ में समरसता का अर्थ सामाजिक समानता है, परंतु समरसता मात्र समानता नहीं है। इसका निहतार्थ है ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’। ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ का अर्थ है, सभी को अपने समझ कर किया जाने वाला व्यवहार (आत्मीयता या आत्मीयता का व्यवहार)। आत्मीयता में संबंधों की प्रगाढ़ता होती है। इस अर्थ में समरसता का दर्शन केवल आध्यात्मिक दर्शन नहीं है, संगठित समाज का  व्यवहारिक चिंतन भी है। यदि व्यापक सामाजिक सन्दर्भ में देखें तो समाजिक समरसता का अर्थ है – आत्मीयता और समादर (सबका सम्मान और सबसे आत्मीयता पूर्ण, आदरयुक्त व्यवहार)।

सामाजिक समरसता : विचार और संस्कार;‘समाजिक समरसता’ समाजिक आदर्श का प्रत्यय और पूर्व प्रत्यय है। वस्तुतः यह समाज के समस्त वर्गों के संगठन का एक अद्वितीय प्रयास है, जिसका लक्ष्य एक विभेद मुक्त, आदर्श सामाज का निर्माण करना है।

       समाजिक समरसता एकात्मता का साक्षात्कार है। इसमें अभिन्नता है और सभी का सभी से एकत्व है। इसमें सामूहिक अस्तित्व की स्वीकृति है। समरसता समता मूलक, बंधुत्व पर आश्रित समाज का विचार है।

आधुनिक सन्दर्भ में इस विचार का प्रतिपादन और व्यवहारिक प्रगटीकरण राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ के द्वारा किया गया है। सामाजिक समरसता की अंतर्वस्तु में संघर्ष के स्थान पर सहस्तित्व, विषमता के स्थान पर समता और समानता, वर्ग चेतना के स्थान पर सर्वमंगल की कामना (सर्वहित की मंगल कामना) निहित होती है।

       संघ के द्वारा प्रतिपादित सामाजिक समरसता की अंतर्वस्तु है; विभेद नहीं एकत्व, संघर्ष नहीं समन्वय और सहस्तित्व, परावलंबन नहीं परस्पर आलंबन एवं सहयोग है। (यह संगठित समाज का आदर्श स्वरुप है)।

मूलतः सामाजिक समरसता का उद्देश्य जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता का जड़मूल से उन्मूलन कर लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहार्द बढ़ाना है। इसका लक्ष्य समाज के सभी वर्णों एवं वर्गों के मध्य एकता स्थापित करना है। राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ समाजिक समरसता को समाज जीवन दर्शन के मूलभूत सिद्धांत के रूप में स्वीकार करता है और इस धारणा का व्यावहारिक प्रगटीकरण भी करता है।

आज समरसता का चिंतन एक आन्दोलन का रूप ले चुका है। यह आन्दोलन केवल वैचारिक आन्दोलन नहीं है, यह सामाजिक सांस्कृतिक आन्दोलन भी है। इसकी प्रकृति शांत, धीर, गंभीर है, परंतु यह प्रभावकारी और परिणामकारी है।

        समरसता की अंतर्वस्तु;

समरसता के चिंतन और दर्शन में निषेध नहीं है, इस लिए यह नकारात्मक नहीं है। मूल प्रकृति में यह एक रचनात्मक आन्दोलन है, जिसका लक्ष्य वैचारिक परिष्कार और सामाजिक सांस्कृतिक विकृतियों का प्रतिकार (तिरस्कार) है। समरसता की अंतर्वस्तु निम्नवत है;


समरसता संघर्ष के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, इसलिए यह प्रतिरोधात्मक आन्दोलन नहीं है। यह पृथकतावादी या अलगाववादी आन्दोलन नहीं है। इसमें छुद्र हितों और आकांक्षाओं संघर्ष नहीं है।


समाजिक समरसता परंपरागत मुक्ति का आन्दोलन नहीं है, (यह विभेद से मुक्ति, संकीर्णता से मुक्ति का आन्दोलन) यह सामान्य सामाजिक सांस्कृतिक और राजनैतिक विरोध से अलग सहस्तित्व और परस्पर निर्भरता का आन्दोलन है।


समाजिक समरसता पहचान और अस्मिता का प्रश्न नहीं है, न हीं इसमें पृथक अस्तित्व या अस्तित्व का आत्मसमर्पण है। इसमें सहअस्तित्व है। तत्वतः इसमें (समत्व, अपनत्व और ममत्व के साथ सामाजिक एकत्व) है।


व्यवहारिक आध्यात्मवाद और समरसता की अवधारणा;

समाजिक समरसता का विचार और संस्कार सनातन भारतीय दर्शन से उपजा है। इसलिए इसमें आध्यात्मिकता भी है और नैतिकता भी है। वस्तुतः यह आन्दोलन आत्मवत सर्वभूतेषु (व्यवहारिक आध्यात्मवाद) के दार्शनिक विचार से प्रेरित है। ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ के विचार पर आधारित ‘सामाजिक समरसता’ भारतीय संस्कृति का आधार है।

समरसता के चिंतन में महात्मा बुद्ध का सम्यक दर्शन और विचार सन्निहित है। इसमें संत रामानंद का व्यवहार और संस्कार, (अस्पर्शी नहीं सर्वस्पर्शी समाज जीवन की कल्पना) भी सम्मिलित है। यह गुरू अमर दास जी (सिख पंथ के तीसरे गुरु) का दर्शन और चिंतन, ‘पहले पंगत, फिर संगत’ की अभिव्यक्ति है। इस तरह यह एक आदर्श समाज निर्माण का व्यावहारिक चिंतन है।

समाजिक समरसता की अनिवार्यता और प्रासंगिकता;

इस आन्दोलन की एक सामाजिक – सांस्कृतिक पृष्ठिभूमि है। यह आन्दोलन ‘न हिन्दु: पतितो भवेत्’ की मान्यता का व्यवहारिक परिणाम है। यद्यपि यह आन्दोलन समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को नकारता है, परंतु केवल सामाजिक विसमता, अस्पृश्यता, छुआ-छूत आदि अतीत के अनुभव के आधार पर इस आन्दोलन का मूल्याङ्कन करना अप्रयाप्त है।

सामाजिक समरसता आदर्श नियमों, सामाजिक मूल्यों से घनिष्ट रूप से सम्बन्धित है। इस आंदोलन की अंतर्वस्तु प्राचीन आग्रहों और दुराग्रहों से मुक्ती है। इसमें समाज में व्याप्त रुढ़ियों से स्वतंत्रता है तथा सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह भी है।

व्यापक सन्दर्भ में सामाजिक समरसता मानवीय अस्मिता, नारी प्रतिष्ठा, समता समानता और सांस्कृतिक समरसता का संस्कारनिष्ठ कार्य है। इसलिए वर्तमान के अनुभव के रूप में उसका विश्लेषण और मूल्याङ्कन आवश्यक है।

आन्दोलन की विश्वसनीयता;

राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहता है, जिसमें विभेद नहीं है, संघर्ष नहीं है, पूर्वाग्रह नहीं है, दुराग्रह नहीं है। जिसमें भिन्नता नहीं है, द्वन्द नहीं है। जिसमें संकीर्णता नहीं है, पृथकता नहीं है। जहां सब समरस, सब एकरस, एकाकार हैं।

समरसता में सदसयता है, सहृदयता है। समरसता में सहकार है, सरोकार है। समरसता में आत्मीयता है, सद्भाव है। समरसता सहयोगपूर्ण व्यवहार है। इस प्रकार यह समाजवाद, साम्यवाद और अन्य सभी वादों विवादों से ऊपर मानवता का दर्शन है। इसमें मानव समाज की अखण्डता, समग्रता एवं अद्वैत का बोध होता है।

गुणात्मक एवं भावनात्मक रूप से समाजिक समरसता की अवधारणा अन्य समकालीन अवधारणओं से श्रेष्ठ है।  इसलिए समाजिक समरसता को समाज परिवर्तन के सतत सामूहिक प्रयास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इस आन्दोलन में निरंतरता है और व्यापकता है। समरसता के इस आन्दोलन का प्रभाव समाज जीवन के समस्त पक्षों अर्थात् सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनितिक एवं धार्मिक पक्ष पर समान रूप से पड़ रहा है।

समरसता का सुखद परिणाम यह होगा कि हम सब के विचार एक होंगे। इससे ‘वयं हिंदूराष्ट्रांग भूता’ अर्थात हम एक राष्ट्र के अंग है, यह एक अद्भुत आकांक्षा पूर्ण होगी।



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