श्लोक:
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥
अर्थ:
आत्मज्ञान का आलोक है,
काम-क्रोध से नहीं काम है।
जित जाएँ हम चित्त वृत्ति को,
निर्वाण इसी का तो नाम है।
जो काम-क्रोध आदि से मुक्त हैं, संयमचित्त हैं और आत्मज्ञानी हैं, ऐसे यतियों के लिए चारों ओर ब्रह्म-निर्वाण विद्यमान है।
मुख्य बिंदु और व्याख्या
काम और क्रोध क्या है? यह पहला बिंदु है। क्रोध का काम से क्या संबंध है? 'संयम' से क्या आशय है?
'अभितो ब्रह्मनिर्वाणम्' का अर्थ है कि चारों तरफ मुक्ति है।
मूल बात: जब हम विषय को गहराई से समझते हैं, तो अर्थ स्पष्ट होने लगता है। चाहे वह गीता के श्लोक हों या कोई अन्य ग्रंथ, यदि भिन्नता दिखाई दे तो समझ अधूरी है। पूरी गीता एक ही बात समझाने के लिए 700 श्लोकों में विस्तार लेती है।
देह, अहंकार और भौतिकता
काम क्या है? भीतर का 'अहम्' (अहंकार) ही पहला रिश्ता देह से बनाता है। मान्यता यह रहती है कि "यह देह मेरी है", जबकि वह किसी की सगी नहीं है। देह अहंकार का पहला उपकरण है, जैसे कलम एक उपकरण है।
भौतिकता: शरीर भौतिक होता है। जो कुछ इंद्रियों द्वारा अनुभूत होता है, उसे भौतिक कहते हैं। यदि कोई वस्तु पाँचों ज्ञानेंद्रियों, कर्मेंद्रियों और मन की पकड़ में आ जाए, तो वह भौतिक है।
पहचान: देह ही देह को प्रमाणित करती है। यदि ज्ञानेंद्रियाँ नहीं होंगी, तो कोई आपको पहचान नहीं पाएगा।
दर्शन और विज्ञान (डेकार्ट और मास-ऊर्जा)
रेने डेकार्ट (1596-1650): इनका प्रसिद्ध वाक्य है— "Cogito, ergo sum" (मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ)।
अहंकार का खेल: अहंकार पैदा हुआ है देह से और वह देह को ही लेकर भागता है। अहंकार अपनी अपूर्णता को पूरा करने के लिए देह का इस्तेमाल करता है और भौतिक चीजों की खोज में निकलता है।
ऊर्जा का सिद्धांत: भौतिक पदार्थ के साथ ऊर्जा हमेशा जुड़ी रहती है।
भौतिक पदार्थ = ऊर्जा (दोनों एक ही हैं)।
Mass = Energy (द्रव्यमान ही ऊर्जा बन जाता है)।
भौतिक जगत ऊर्जा का ही खेल है।
मनोवैज्ञानिक चक्र: अज्ञान बनाम ज्ञान
नोट्स में दो प्रकार के जीवन चक्रों का वर्णन किया गया है:
1. अज्ञान का केंद्र (अंधी व्यवस्था):
जब केंद्र में अज्ञान होता है, तो जीवन इस क्रम में चलता है:
अज्ञान \rightarrow उत्साह \rightarrow काम \rightarrow क्रोध \rightarrow अवसाद
अज्ञानी व्यक्ति असफलता मिलने पर बिखर जाता है।
अज्ञान के केंद्र से 'दुराग्रह' जन्म लेता है।
2. ज्ञान का केंद्र (जागरूक व्यवस्था):
जब केंद्र में ज्ञान होता है, तो ऊर्जा का रूपांतरण सकारात्मक होता है:
उत्साह से प्रेरणा उठती है।
ऊर्जा/क्रोध से संकल्प उठता है।
अवसाद से विरह (तड़प/खोज) उठता है।
ज्ञानी व्यक्ति का संकल्प और भी सुदृढ़ हो जाता है। अज्ञान हटने पर विकार भी हट जाते हैं।
ज्ञान के केंद्र से 'सत्याग्रह' जन्म लेता है।
संयम और धैर्य
संयम क्या है? जो चाहा था वह नहीं मिला, फिर भी विचलित न होना 'धैर्य' कहलाता है।
जब यह समझ आ जाए कि "यही सच्चाई है, मैं डिगूँगा नहीं", तो उसे संयम कहते हैं।
कोई भी चीज़ अपने आप में बुरी नहीं है; यदि वह निंदा के योग्य लग रही है, तो वह केवल देखने वाले का अज्ञान है।
No comments:
Post a Comment